Thursday, May 15, 2008

think out of the boundaries

मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया हर फिक्र को धुएँ मैं उड़ता चला गया, बर्बादियों का शोक मानना फिजूल था बर्बादियों का जशन मनाता चला गया मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया .....जो मिल गया उसी को मुक़द्दर समझ लिया जो खो गया मैं उसको भूलता चला गया मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया
गम और खुशी मे फर्क न महसूस हो जहा मैं दिल को उस मुकाम पे लाता चला गया मैं जिंदगी .....सिद्धार्थ